एक व्यक्ति साइकिल से राष्ट्रपति से गुहार लगाने समस्तीपुर से निकला है

raghwendra kumar karn

24 सालों से अपनी खोई नौकरी को वापस पाने के लिए दर-दर की ठोकर खाने के बाद अब इंसाफ की मांग को लेकर एक व्यक्ति साइकिल से राष्ट्रपति से गुहार लगाने समस्तीपुर से निकला है. राघवेंद्र नाम के शख्स की बस यही मांग है कि महामहिम राष्ट्रपति से न्याय मिले या फिर आत्महत्या की अनुमति.
दरभंगा के मूल निवासी और समस्तीपुर में रहने वाले राघवेंद्र कुमार कर्ण की साल 1990 में सांख्यिकी विभाग में कनीय क्षेत्रीय अन्वेषक पद पर नियुक्ति हुई थी. लेकिन नौकरी मिलने के करीब चार साल बाद ही उन्हें नौकरी से पदमुक्त कर दिया गया. इसके बाद राघवेंद्र ने न्याय के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया लेकिन उन्हें अब तक इंसाफ नहीं मिला.
इधर इंसाफ के लिए दर-दर भटक रहे परिवार पर आर्थिक संकट भी गहराने लगा. पहले तो पांच बच्चों की परवरिश, पढ़ाई-लिखाई और अब दो बेटियों की शादी की चिंता सत्ता रही है. पीड़ित परिवार को अब एक आखिरी उम्मीद बची है कि शायद महामहिम राष्ट्रपति से उन्हें इंसाफ मिलेगा.
राघवेंद्र की बेटियों ने कहा कि आर्थिक तंगी के बबवजूद भी किसी तरह ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई तो पूरी हो गई लेकिन आगे अपने सपने को साकार करने के लिए उतने पैसे नहीं है कि किसी अच्छी संस्थान में पढ़ाई कर सके. अपने सपने को साकार करने के लिए हाथ जोड़े बेटियां भी महामहिम से फरियाद कर रही है. इनके पड़ोसियों को भी उम्मीद है कि राष्ट्रपति न्याय करेंगे.
PENTAROMA
पिछले 24 सालों से अपनी खोई हुई नौकरी पाने के लिए दर-दर भटक रहे राघवेंद्र ने कहा कि 1988 में बिहार राज्य अवर सेवा चयन परिषद के द्वारा बिहार सरकार के विभिन्न विभागों में नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाली गई थी. प्रतियोगिता परीक्षा पास करने के बाद सांख्यिकी विभाग में कनीय क्षेत्रीय अन्वेषक पद पर उनके साथ कुल 65 लोगों की नियुक्ति की गई थी लेकिन नौकरी के चार साल बाद ही नोटिस देकर कुल 32 लोगों की सेवा समाप्त कर दी गई थी.
राघवेंद्र का कहना है की अब इंसाफ पाने के लिए एक आखिरी उम्मीद लेकर समस्तीपुर से साइकिल यात्रा करके दिल्ली जा रहे है. अगर वहां भी उन्हें इंसाफ नहीं मिलता है तो वो महामहिम राष्ट्रपति से आत्महत्या करने की अनुमति मांगेंगे.
अब देखने वाली बात होगी की राघवेंद्र के साथ महामहिम राष्ट्रपति से राघवेंद्र को न्याय मिलता है या वहां से भी निराशा हाथ आती है.

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